महाराष्ट्र सियासत: किसने क्या खोया और क्या पाया? जानें क्या है आगे की मंजिल

संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन सदन खत्म होने के बाद शरद पवार सीधे कांग्रेस के सबसे बड़े पावर सेंटर 10 जनपथ पहुंचे. मीडिया में खबर जोरदार तरीके से चल रही थी कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर सोनिया से शरद की आखिरी दौर की बातचीत चल रही है. हर किसी को इसी बात की उम्मीद थी कि एजेंडा तय होगा, न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय होगा. लेकिन बैठक के बाद शरद पवार सीधे अपने घर चले गए और प्रेस कॉन्फ्रेंस की. शरद पवार ने इसके बाद सीधे गुगली फेंकी, जिससे सरकार बनाने की अटकलें सियासी पिच पर नाचती नज़र आईं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या बोले शरद पवार…

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने कहा कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर सोनिया गांधी से हमारी कोई बात नहीं हुई है. तभी सवाल आया कि शिवसेना बोल रही है आप उनसे साथ हैं. लेकिन शरद पवार ने कहा कि मैं सभी के साथ हूं, आपके भी साथ हूं. जहां तक सरकार की बात है, तो शिवसेना ने बयान दिया है और उनसे ही पूछ लो.

अब आगे क्या?

जो लोग भी शरद पवार की सियासत को जानते हैं उन्हें अच्छे से पता है कि उनका दाहिना हाथ क्या करता है, वो बाएं को भी पता नहीं होता है. जाहिर है ये पवार की रणनीति भी हो सकती है. लेकिन तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और बयान पर नजर डालें तो खेल कुछ फंसता नजर आ रहा है. इसके लिए संजय राउत के बयान को गौर से देखने की जरुरत है.

महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर शिवसेना की ओर से तलवार भांज रहे संजय राउत ने भी कांग्रेस-एनसीपी से समझौते की कोशिशों के बीच हैरान करने वाली बात कह डाली. शरद पवार से मुलाकात के बाद संजय राउत ने कहा कि सरकार बनाने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है, जिनकी जिम्मेदारी है वो भाग रहे हैं. साथ ही उन्होने कटाक्ष भी किया कि शरद पवार को समझने में कई जन्म लगेंगे.

अब सवाल ये है कि जो भाग रहे हैं वो कौन हैं? इतना ही नहीं उसके दूसरे ही दिन संजय राउत ने एक फिर बड़ी और पहले से बेहद महत्वपूर्ण बयान दे डाला. उन्होंने एक सवाल के जवाब में दो टूक कहा कि उनकी पार्टी सावरकर को भारत रत्न देने के समर्थन में पहले भी थी और आगे भी रहेगी.

गौर करने की बात है कि पिछले हफ्ते मुंबई में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी नेताओं की एक बैठक हुई थी. कहा जा रहा था कि ये नेता न्यूनतम साझा कार्यक्रम को लेकर चर्चा कर रहे हैं. बात छन-छन कर बाहर आई और कहा गया कि कांग्रेस चाहती है कि शिवसेना अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि को बदले, सावरकर को भारत रत्न जैसे मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाले.

राजनीति को थोड़ी भी समझ रखने वाला व्यक्ति ये आसानी से समझ सकता है कि सावरकर को भारत रत्न देने का समर्थन करने वाली पार्टी को कांग्रेस भला कैसे कबूल कर लेगी? तब क्या ये मान लिया जाए कि सरकार बनाने की राह में कोई रोड़ा आ गया है.

क्या है शिवसेना का रुख?

इस पूरे मामले में सबसे मुश्किल में फंस शिवसेना गई. बीजेपी के साथ लंबे समय का रिश्ता तोड़ कर कांग्रेस और शिवसेना के साथ सरकार बनाने की एकतरफा घोषणा उसकी तरफ से की गई. केंद्र से अपने मंत्री तक को इस्तीफा दिलवा दिया, संजय राउत रोज नई सरकार, नई राह, नया सवेरा की बात कर रहे हैं, लेकिन शरद पवार के बयान के बाद सरकार बनाने को लेकर धुंध बहुत साफ होती नजर नहीं आ रही है.

बीजेपी पर रोज करारा वार कर रही शिवसेना इस राह पर इतनी आगे आ चुकी है कि उसके लिए यू-टर्न भी थोड़ा मुश्किल है. इस बीच शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे 22 नवंबर को विधायकों के साथ बैठक करने वाले हैं. माना जा रहा है कि इसमें शिवसेना की आगे की रणनीति साफ हो पाएगी.

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