हरियाणा और महाराष्ट्र में राहुल गांधी अच्‍छे प्रदर्शन के बाद भी खुश नहीं हैं, ये है वजह..

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिली उम्मीद से ज्यादा सीटों से भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी खुश नहीं है. जी हां, ये हम नहीं बल्कि नतीजे के बाद से अब तक उनका व्यवहार बता रहा है. 2019 लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद राहुल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए अपने चार पन्ने के पत्र में कई बातें लिखी थीं. उन्होंने लिखा था कि बतौर वायनाड सांसद वो अपनी जिम्मेदारी निभाने के साथ पार्टी के लिए हमेशा एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरह खड़े रहेंगे. कहीं न कहीं अभी भी राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद पार्टी के अंदर ओल्ड गार्ड बनाम यूथ टीम की भिड़ंत चल रही है, जो कि पार्टी का नुकसान कर रही है.

अंदरूनी लड़ाई से पार्टी को हुआ नुकसान


राहुल गांधी ने हरियाणा और महाराष्ट्र में कई चुनावी रैलियां कीं, लेकिन चुनाव के दौरान जिस तरह की अंदरूनी कलह से पार्टी गुज़र रही थी, उस हिसाब से उम्मीद नहीं थी कि पार्टी इतना बेहतर नतीजा ला सकती है. यही कारण है कि दोनों ही राज्यों में कांग्रेस बहुत लड़ती हुई नहीं दिखी. महाराष्ट्र में कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी रही, लेकिन हरियाणा में कांग्रेस के नंबर उम्मीद से कहीं ऊपर रहे. यहां तक कहा जाने लगा कि अगर आलाकमान हुड्डा पर फैसला जल्दी लेती तो कांग्रेस सरकार बना लेती.

राहुल के भरोसेमंद नेताओं के पर कतरे

हरहाल, इन सभी आकलन, बयान और हौसलाअफजाई के बीच नतीजे के एक हफ्ते बाद भी राहुल गांधी की तरफ से एक ट्वीट या फिर एक बयान तक नहीं आया है. राहुल गांधी ने भले ही स्टार प्रचारक के नाते हरियाणा और महाराष्ट्र में रैलियां कीं, लेकिन बहुत आक्रामक तरीके से प्रचार में नहीं दिखे. राहुल गांधी की ही पसंद हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर थे, जिन्होंने सोनिया गांधी के आवास के बाहर गाड़ी के ऊपर खड़े होकर हुड्डा के खिलाफ अपना विरोध दिखाया था. जबकि महाराष्ट्र में पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठे निरुपम भी राहुल गांधी के भरोसे के नेता थे. ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इन नेताओं ने जितना डेंट पार्टी को दिया उतनी ही उंगलियां राहुल गांधी पर भी उठीं. शायद यही कारण है कि हरियाणा के महेंद्रगढ़ में सोनिया गांधी को रैली करनी थी, जिसे बाद में राहुल गांधी ने किया. जब हुड्डा को ये बात पता चला तो वो रैली में शामिल नहीं हुए.

दिल्‍ली में सोनिया गांधी के नजदीकी को मिला पद
कहीं न कहीं अभी राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद भी पार्टी के अंदर ओल्ड गार्ड बनाम यूथ टीम की भिड़ंत चल रही है. ये अंदरूनी लड़ाई कई बार देखने को भी मिली है. कांग्रेस के जानकरों की मानें तो दिल्ली अध्यक्ष पर फैसला लेने में इसलिए पार्टी को वक्त लगा क्योंकि यहां भी सोनिया गांधी की टीम किसी और नेता को अध्यक्ष पद पर चाहती थी. जबकि राहुल गांधी किसी और को जिम्‍मेदारी देना चाहते थे. आखिरकार इसमें सोनिया गांधी की टीम की जीत हुई.

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